भारतीय संगीत का संक्षिप्त इतिहास (A SHORT HISTORY OF INDIAN MUSIC)

भारतीय संगीत के इतिहास को मोते तौर से हम तीन भागों में बाँट सकते हैं-

1. प्राचीन काल की संगीत (Primordial- 9th Century)- Old Age Music History

2. मध्यकालीन भारत में संगीत (9th - 19th Century)- Middle Age Music History

3. आधुनिक भारत में संगीत (19th Century - till date)-Modern Age Music History



प्राचीन काल की संगीत (आदि काल - 9th Century)
इस काल का प्रारम्भ आदि काल से माना जाता है। इस काल में चारों वेदों की रचना हुई।वेदों में सामवेद प्रारम्भ से अंत तक संगीतमय है। धीरे धीरे स्वरों की संख्या विकसित हुई। भरत नाट्यशास्त्र,  जो 4 वीं शताब्दी ईस्वी (4th Century) में लिखा गया था,  यह संगीत की महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें संगीत को सप्तक(7) और बाईस(22) कुंजियों में विभाजित किया है। प्राचीन धारणा के अनुसार, ये बाईस श्रुतियां ही एकमात्र कुंजी हैं जो मनुष्य द्वारा बनाई जा सकती हैं, इसमें बताई हुई और भी कई मुख्य बातें आज भी प्रचार में है और इन्हें शास्त्रीय संगीत का आधार माना जाता है इसके बाद 9 वीं ईस्वी(9th Century) में मतंगा द्वारा लिखित `बृहदेशी` एक ग्रंथ आया जिसमे की इतिहास में सर्वप्रथम इसी ग्रंथ में 'राग' शब्द का प्रयोग किया गया था और आज राग का बहुत महत्व है`संगीता मारकंडा'; ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी(11th Century) में नारद द्वारा लिखित, जो निन्यानबे(99) रागाओं की गणना करता है और उन्हें मर्दाना और स्त्री प्रजातियों में वर्गीकृत करता है; सोलहवीं शताब्दी ईस्वी(16th Century) में रामामात्य द्वारा लिखित `स्वरामेला कलानिधि' और सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी(17th Century) में वेंकट माखी द्वारा लिखित चतुर्दंडी प्रेरिका वैदिक काल के अंत में यानी तीन हजार से बारह सौ ईसा पूर्व के बीच, संगीत सामगान के रूप में प्रचलित था, जो विशुद्ध रूप से संगीत पैटर्न में छंद का एक मंत्र था, इस काल में महाकाव्यों को संगीत के स्वरों में सुनाया जाता था जिन्हें `जाटिगन ‘कहा जाता था।

मध्यकालीन भारत में संगीत(9th - 19th Century)
नवीं शताब्दी से 12वी शताब्दी तक भारतवर्ष में संगीत की अच्छी उन्नति हुई। उस समय की रियासतों में संगीत को बड़ा प्रोत्साहन मिला। प्रत्येक रियासत में अच्छे-अच्छे गुणि कलाकार रहते है जिसको राज्य की ओर से अच्छी तनख्वाह(Salary) जाती थी। यह काल संगीत का स्वर्ण युग कहा गया है।(Golden Age of Music) लेकिन फिर 11वी शताब्दी से मुसलमानों का आक्रमण शुरू हो गया (Attack on music community)और 12वी शताब्दी तक वे भारत के शाशक(ruler) हो गए। उनकी सभ्यता(behaviour), उनका संस्कृति(culture) का प्रभाव हमारे भारतीय संगीत पर पड़ा विशेषकर उत्तरी भागों के संगीत में ही ज्यादा पड़ा और परिणामस्वरूप उत्तरी भाग में गये जाने वाला संगीत दक्षिणी भाग के संगीत से अलग होता चला गया। इस तरह भारतीय संगीत की प्रकृति में बदलाव आया और फिर हमारा भारतीय संगीत धीरे-धीरे हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत के दो अलग-अलग रूपों में बंटने लगा। 14वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास ही संगीत की इस दो परंपराओं का विचलन(deviation) शुरू हुआ। फारसी(Persian) प्रभाव ने भारतीय संगीत की उत्तरी शैली में पर्याप्त बदलाव लाया। 15वी शताब्दी ईस्वी में, भक्ति ध्रुवपद 'ध्रुपद' या शास्त्रीय रूप में गायन में बदल गया। 18वीं शताब्दी ईस्वी में गायन के एक नए रूप के रूप में 'खयाल' का विकास हुआ। आज हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत दोनों ही महान आत्मसात शक्ति को व्यक्त करते हैं, लोक धुनों और क्षेत्रीय विशेषताओं को अवशोषित करने के साथ-साथ इनमें से कई धुनों को रागों की स्थिति तक बढ़ाते हैं। इस प्रकार, संगीत की इन दो प्रणालियों ने परस्पर एक दूसरे को प्रभावित किया है।

मध्यकाल में संगीत के कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथ भी लिखे गये। जैसे: 
(Holy Ancient Books of Music)

1. संगीत मकरन्द : इस ग्रंथ के रचयिता नारदमुनि हैं। इसमें रागों को स्त्रीपुरुष और नपुंसक वर्गों में विभाजित किया गया है।

2. गीत गोविंद : इसकी रचना 12वी शताब्दी में जयदेव द्वारा हुई। जयदेव केवल कवि नही गायक भी थे। इस ग्रंथ में प्रबंधों और गीतों का संग्रह हैलेकिन उस समय के काल मे स्वरलिपि(Notation) ना होने के कारण आज हम उसे वैसे नही गा सकते।

3. संगीत रत्नाकर : इसकी रचना 13वी शताब्दी में शारंगदेव द्वारा हुई। यह ग्रन्थ केवल उत्तरी संगीत में ही नहीबल्कि दक्षिणी संगीत में भी अति महत्वपूर्ण माना जाता है। इस ग्रन्थ से हमे संगीत संबंधी बहुत सारी समस्याओं का समाधान हुआ है।

अकबर के शाशन-काल में संगीत की बहुत उन्नति हुई। अकबर स्वयं बड़ा संगीत-प्रेमी(music lover) था। 'आईने अकबरी' के अनुसार अकबर के दरबार में छत्तीस(36) संगीतज्ञ थे, और उनमें से सबसे खास था 'तानसेन' (तानसेन का असली नाम तन्ना मिश्र था।) उन्होंने अनेक रागों की रचना की जिसमें से कुछ मुख्य राग है- दरबारी कन्नडा, मियां की सारंग, मियां मल्हार। अकबर के समय ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर, गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, जैसे महान कवियों और कवयित्रियों के द्वारा जनता में संगीत का प्रचार बड़ा। दूसरी तरफ दक्षिणी के पुण्डरीक बिटठल ने चार ग्रंथों की रचना की- राग-माला, राग मंजरी, सतद्राग चन्द्रोदय और नर्तन-निर्णय

जहांगीर के दरबार मे भी कई संगितज्ञ थेजैसे बिलास खाँ छतर खाँमक्खू आदि। 1910 में दक्षिण के विद्वान पण्डित सोमनाथ ने 'राग-विबोध' नामक पुस्तक लिखी।

शाहजहाँ के दरबारी संगितज्ञों के नाम- दिरंग खाँ और ताल खाँ जिन्हें शाहजहाँ ने 'गुण-समुद्र' की उपाधि(title/degree) दी और जगन्नाथ को 'कविराज' की उपाधि दी।

औरंगज़ेब संगीत का कट्टर विरोधी था। जब उनका शाशन आया तो उसने संगीत को जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया। संगितज्ञों के वाद्य जला दिए और उन्हें संगीत छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। परंतु संगीत में इतनी सच्चाई थी कि उनका क्रूर अत्याचार संगीत को न रोक सका। उसके बाद 18वी शताब्दी में मुसलमानों का राज्य धीरे धीरे समाप्त होने लगा और अंग्रेजों का प्रभुत्व(domination) बढ़ने लगा। केवल रियासतों(Princely states)श्रीनिवास द्वारा लिखी गयी 'राग तत्व विबोध' नामक ग्रन्थ इसी समय की है और इस काल में त्रिवतगज़लतरानाआदि का प्रचार शुरू हुआ। किन्तु अब तक कोई भी स्वरलिपि नही थी जिनके आधार पे संगीत को गाया जाए।

आधुनिक भारत में संगीत(19th Century - till date) - Modern Music History

भारत में अंग्रेजों के आगमन के साथ फ्रांसीसी (french),डच (dutch),पोर्तुगीज, (Portugal) आदि आये परन्तु अंग्रेजों (Britishers) ने ही धीरे-धीरे लगभग पूरे भारत पर अपना शाशन जमा लिया। उनके मुख्य उद्देश्य शाशन करना और धन कमाना था। फलस्वरूप संगीत कला में गिरावट आई क्योंकि वे लोग जो धन के लालची थे उन्हें संगीत जैसी शुद्ध और पवित्र कला का प्रचार करना व्यर्थ ही होगा। दूसरी ओर अधिकांश नवाबों और महानुभावों के पास अब अपना धन नहीं अब नही बचा था और कलाकारों पर जोर देने के लिए पुरस्कार नहीं थे, इसलिए अधिकांश संगीतकारों को अन्य व्यवसायों में जाना पड़ा। फलस्वरूप संगितज्ञों की कमी होने लगी। धीरे धीरे संगीत समाज की कुलटा स्त्रियों (Prostitutes) के हाथ जा लगा। समाज ऐसे लोगो से घृणा करता ही था, संगीत से भी घृणा करने लगा। संगीत आमोद प्रमोद(ऐश, आनदं) का साधन बन गया। यहाँ तक कि सभ्य समाज में संगीत का नाम लेना पाप समझा जाने लगा। 

ठीक ऐसे ही समय जहां समाज के अधिकांश लोग(Majority of the Society) संगीत से घृणा करते थे, वहां संगीत के कुछ सेवक भी थे जिन्होंने संगीत रूपी दीपक को बुझने से बचाया। बंगाल के Sir Sourendra Mohan Tagore ने 19वी शताब्दी में अंतिम क्षणों में 'UNIVERSAL HISTORY OF MUSIC' नामक पुस्तक की रचना की। 19वी शताब्दी के बाद 20वी शताब्दी के प्रारंम्भ से ही संगीत का प्रचार प्रसार फिर से होने लगा।  और इसका मुख्य श्रेय स्वामी पं० विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और विष्णुनारायण भातखंडे को है।विष्णु दिगम्बर जी ने संगीत का क्रियात्मक पक्ष(Practical/Functional Aspect) और भातखंडे जी ने शास्त्रीय पक्ष(Theoretical/Academic Aspect) लिया। दोनों ने अपने अपने पक्ष को शक्तिशाली बनाया। इस प्रकार से सच्चे रूप से संगीत का प्रचार फिर से शुरू हो सका। आकाशवाणी (All India Radio) और चलचित्र (Cinema) द्वारा भी संगीत का काफी प्रचार हो हुआ।

After 1947:

स्वतंत्रता के बाद(After 1947) जब अंग्रेज़ देश छोड़कर चले गए तब संगीत में और मजबूती बनी। संगीत के प्रचार और प्रसार में सरकार(Government of India) का विशेष हाथ रहा। आकाशवाणी के स्तर को बढ़ाने के लिए उसमें भाग लेने वाले कलाकारों की ध्वनि-परीक्षा (Sound-Test/Vocal Test/Audition) हुई। आकाशवाणी प्रति वर्ष एक संगीत प्रतियोगिया (Music-Competition) और एक संगीत सम्मेलन(Musical-Program/Musical Get-together) आयोजित करता है। सरकार ने 31st May, 1952 में 'SANGEET NATAK ACADEMY' स्थापित की जो अब तक संगीत की सेवा कर रही है। संगीत में उच्च शिक्षा(Higher Education in Music/Advanced Level Training) के लिए योग्य विद्यार्थियों को प्रति माह छात्रवृत्ति दी गई। प्रति शनिवार को 9:30pm - 11:00pm तक भारत के प्रमुख संगितज्ञों का प्रदर्शन(Performance) होता है।आकाशवाणी ने केवल शास्त्रीय संगीत को ही नही बल्कि गज़ललोकगीतभजन आदि को भी बहुत प्रोत्साहन दिया। विभिन्न केंद्रों में गीत-भजन आदि के रेकॉर्ड तैयार कराये गये। दूसरी तरफ लोकप्रिय संगीत या `पॉप` संगीत का प्रसार तेजी से देखा गया और सिनेमा के प्रसार के साथ यह प्रवृत्ति बढ़ती गई।

After 1960s :

1960 के बाद शास्त्रीय संगीत को भी देश से बाहर(International) निर्यात किया जाने लगा और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत(Western Classical Music) को भारतीय शास्त्रीय रूप में संयोजित करने का एक प्रयोग किया गया। इसने लोकप्रिय रूप से फ्यूजन संगीत(Fusion) के रूप में जाना जाता है।

1970s & 1980s:

1970 और 1980 में डिस्को(Disco) और पॉप संगीत (Pop Music) ने धमाकेदार भारतीय संगीत दृश्य में प्रवेश किया।

1990s:

90s में भारतीय दर्शकों के बीच पॉप प्रवृत्ति (Pop Music) को लोकप्रिय बनाया। सूचना प्रौद्योगिकी के और अधिक प्रसार और तेजी से वैश्विक दुनिया के साथहम समकालीन भारत में मौजूद संगीत रूपों के एक मेजबान को देखते हैं- 

रॉक संगीत(Rock Music)आर & बी(Rhythm & Blues, abbreviated as R&B
हिप-हॉप(Hip-Hop)जैज़(Jazz) आदि। 


संगीत के इन पश्चिमी रूपों के अलावा
पारंपरिक रूप भारतीय संगीतजैसे ख्यालग़ज़लगीतठुमरीकव्वाली आदि को भी समकालीन संगीत परिदृश्य में जगह मिलती है। भजन और कीर्तनजो धार्मिक गीतों की एक अलग धारा बनाते हैंदेश भर में भी व्यापक रूप से गाए जाते हैं।  

आज हमारे देश भर में अनेक संस्थाएं(Music School/College/University) हैं जो संगीत की सुलभ शिक्षा दे रही है। इनमें से कुछ मुख्य संस्थायों के नाम:

1. Prayag Sangeet Samiti, Allahbaad
2. Bhatkhande Sangeet Mahavidyalaya, Lucknow
3. Gandharv Mahavidyalaya, Pune
4. School of Indian Music, Mumbai
5. School of Indian Music, Vadodara
6. Bengal Music College, Kolkata
7. Madhav Sangeet Vidyalaya, Gwalior
8. Indra Kala Sangeet Vishwa Vidyalaya (IKSV), Khairagarh, Chattisgarh
9. Musicea Arts and Culture Council, Kolkata
10. Rabindra Bharti University, Kolkata

इसके अतिरिक्त इलाहबाद, आगरानागपुरकानपुरहिमाचल प्रदेशपंजाब व दिल्ली विश्वविद्यालयो के M.A (Music) हों रहा है। भारत के सम्पूर्ण हाई-स्कूल तथा इंटर में संगीत एक वैकल्पिक(Optional) विषय हो गया है। संगीत की बहुत सी पुस्तकें शास्त्र(music theory) और क्रियात्मक(music performance) दोनो पर लिखी गई।अंग्रेजी में भी संगीत की कुछ अच्छी पुस्तकें प्रकाशित हुई है। संगीत की कुछ पत्रिकाएं(Magazine/Journal) पिछले कई वर्ष से जनता की सेवा कर रही हैं जैसे- बंबई से 'संगीत कला विहार' और हाथरस से 'संगीत'. झांसी से 'संगीत-लहरी' और इलाहाबाद से 'संगीतिका' नामक पत्रिकाएं भी प्रकाशित(Published) होती रहीं किन्तु अब उनका प्रकाशन नही है।


Courtesy: https://hindi.gktoday.in/gk  राग परिचय-भाग -1 हरिशचंद्र श्रीवास्तव


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